Monday, July 7, 2014

चाँद सूरज से ज़मीं की पैरवी करता रहा

चाँद सूरज से ज़मीं की पैरवी करता रहा
खुद अँधेरे में रहा पर रौशनी करता रहा

तितलियाँ गजलों से उड़ कर गैर के घर जा बसीं
और शायर काफ़ियों से मसखरी करता रहा

तुम न थे, बारिश न थी, झोंका न था, मौसम न था
कुछ न था, पर कुछ तो था जो गुदगुदी करता रहा

क्या सज़ा दूँ उस कबूतरबाज़ शातिर चोर को?
आँख के रस्ते जो दिल की तस्करी करता रहा

फिर से वो आवाज़ आई 'अब हमें इन्साफ दो'
और दिल्ली का 'मसीहा' दिल्लगी करता रहा

अंग-रेजी बोल कर सब लूट कर वो ले गए
और अपना मुल्क़ हिंदी-फ़ारसी करता रहा

Friday, February 22, 2013

मुहर जिसने लगाई थी



मुहर जिसने लगाई थी शहर भर की तबाही पर
अदालत दे रही है फ़ैसले उसकी गवाही पर

तमाशा देखते हैं खिड़कियों से सब शहरवाले
मदार भी बहुत खुश है सभी की वाह- वाही पर

ज़माने लद गए जब बादशा’ इंसाफ़ करते थे
यहां तो दाग़ है खुद दामन-ए-ज़िल्ले-इलाही प

बहुत सारे ज़रूरी काम होंगे आपको, साहब
कहां फ़ुर्सत है जो सोचें किसी की बेगुनाही पर

वो पागल था तो उसके शेर भी क्या खूब होते थे
समझदारी ने ताला जड़ दिया उसकी सियाही पर