Monday, July 7, 2014

चाँद सूरज से ज़मीं की पैरवी करता रहा

चाँद सूरज से ज़मीं की पैरवी करता रहा
खुद अँधेरे में रहा पर रौशनी करता रहा

तितलियाँ गजलों से उड़ कर गैर के घर जा बसीं
और शायर काफ़ियों से मसखरी करता रहा

तुम न थे, बारिश न थी, झोंका न था, मौसम न था
कुछ न था, पर कुछ तो था जो गुदगुदी करता रहा

क्या सज़ा दूँ उस कबूतरबाज़ शातिर चोर को?
आँख के रस्ते जो दिल की तस्करी करता रहा

फिर से वो आवाज़ आई 'अब हमें इन्साफ दो'
और दिल्ली का 'मसीहा' दिल्लगी करता रहा

अंग-रेजी बोल कर सब लूट कर वो ले गए
और अपना मुल्क़ हिंदी-फ़ारसी करता रहा

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